श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 40: कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना  »  श्लोक 43-44h
 
 
श्लोक  8.40.43-44h 
एष मुख्यतमो धर्म: क्षत्रियस्येति न: श्रुतम्॥ ४३॥
यदाजौ निहत: शेते सद्भि: समभिपूजित:।
 
 
अनुवाद
हमने सुना है कि क्षत्रिय का उत्तम धर्म यही है कि वह युद्ध में मारा जाए और रणभूमि में सो जाए तथा सत्पुरुषों के आदर का पात्र बने ॥43 1/2॥
 
We have heard that the best religion for a Kshatriya is to be killed in a war and sleep on the battlefield and become the object of respect of good men. ॥ 43 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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