श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 40: कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  8.40.35-36 
एवं विद्वञ्जोषमास्स्व शृणु चात्रोत्तरं वच:।
वासांस्युत्सृज्य नृत्यन्ति स्त्रियो या मद्यमोहिता:॥ ३५॥
मैथुनेऽसंयताश्चापि यथाकामवराश्च ता:।
तासां पुत्र: कथं धर्मं मद्रको वक्तुमर्हति॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
विद्वान राजा शल्य! यह समझकर अब आप चुपचाप बैठकर मेरी बात सुनें। जो स्त्रियाँ मदिरा के नशे में चूर होकर वस्त्र उतारकर नाचती हैं, जो संयम और मर्यादा के बिना मैथुन करती हैं और अपनी इच्छानुसार किसी भी पुरुष का वरण करती हैं, उनका नीच पुत्र दूसरों को धर्म का उपदेश कैसे दे सकता है?॥ 35-36॥
 
Learned King Shalya! Having understood this, you should sit quietly and listen to what I am saying next. How can the wretched son of those women who dance after taking off their clothes after being intoxicated by wine, who indulge in sex without restraint and decorum and who choose any man according to their desire, preach Dharma to others?॥ 35-36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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