श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  8.37.45 
तत: प्रायात् प्रीतिमान् वै रथेन
वैयाघ्रेण श्वेतयुजाथ कर्ण:।
स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां
धनंजयं त्वरया पर्यपृच्छत्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् कर्ण उस व्याघ्रचर्म से मढ़े तथा श्वेत घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर प्रसन्नतापूर्वक चल पड़ा। पाण्डव सेना को अपने सामने खड़ी देखकर उसने उत्सुकतापूर्वक धनंजय का पता पूछा।
 
Thereafter Karna set out very happily in that chariot covered with tiger skin and drawn by white horses. Seeing the Pandava army standing right in front of him he eagerly inquired about the whereabouts of Dhananjaya. 45.
 
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे सप्तत्रिंशोऽध्याय:॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७॥

 
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