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mahabharat 8.37.43: संजय कहते हैं- हे राजन! तब मद्रराज शल्य 'ऐसा ही हो' कहकर चुप हो गए। उन्होंने कर्ण के कथन का कोई उत्तर नहीं दिया। तब युद्ध की इच्छा से कर्ण ने उनसे कहा- 'शल्य! रथ आगे बढ़ाओ।' 43.   |   mahabharat अध्याय 8.37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  8.37.43 
संजय उवाच
एवमस्त्विति मद्रेश उक्त्वा नोत्तरमुक्तवान्।
याहि शल्येति चाप्येनं कर्ण: प्राह युयुत्सया॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं- हे राजन! तब मद्रराज शल्य 'ऐसा ही हो' कहकर चुप हो गए। उन्होंने कर्ण के कथन का कोई उत्तर नहीं दिया। तब युद्ध की इच्छा से कर्ण ने उनसे कहा- 'शल्य! रथ आगे बढ़ाओ।' 43.
 
Sanjaya says- O King! Then Madra king Shalya said 'So be it' and became silent. He did not give any reply to Karna's statement. Then Karna, with the desire of war, said to him- 'Shalya! Take the chariot forward'. 43.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)