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mahabharat 8.37.41: संजय बोले: हे राजन! जब महामनस्वी मद्रराज शल्य शत्रु की प्रशंसा करते हुए बहुत कटु वचन बोलने लगे, तब कौरव सेनापति और शत्रुओं को सताने वाले कर्ण ने अत्यन्त क्रोधित होकर शल्य से कहा।   |   mahabharat अध्याय 8.37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  8.37.41 
संजय उवाच
इति बहु परुषं प्रभाषति
प्रमनसि मद्रपतौ रिपुस्तवम्।
भृशमभिरुषित: परंतप:
कुरुपृतनापतिराह मद्रपम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
संजय बोले: हे राजन! जब महामनस्वी मद्रराज शल्य शत्रु की प्रशंसा करते हुए बहुत कटु वचन बोलने लगे, तब कौरव सेनापति और शत्रुओं को सताने वाले कर्ण ने अत्यन्त क्रोधित होकर शल्य से कहा।
 
Sanjaya said: O King! When the great-minded Madra king Shalya started speaking many bitter words praising the enemy, then the Kaurava commander and enemy-tormentor Karna became very angry and spoke to Shalya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)