श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  8.37.4-5 
नि:सरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात् सप्त महाग्रहा:॥ ४॥
उल्कापाताश्च संजज्ञुर्दिशां दाहास्तथैव च।
शुष्काशन्यश्च सम्पेतुर्ववुर्वाताश्च भैरवा:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस समय सौरमण्डल से सात बड़े-बड़े ग्रह निकलते हुए दिखाई देने लगे, उल्काएँ गिरने लगीं, सब दिशाओं में अग्नि के समान आकृतियाँ जलने लगीं, बिना वर्षा के ही बिजली कड़कने लगी और भयंकर आँधी चलने लगी ॥4-5॥
 
At that time, seven large planets were seen emerging from the solar system, meteors began to fall, fire-like structures began to burn in all directions, lightning began to strike without any rain and a terrible storm began to blow. ॥4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)