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mahabharat 8.37.35: इन्द्र के समान बल और प्रभाव वाले अर्जुन के अतिरिक्त इस संसार में और कौन ऐसा पराक्रमी है जो वन्य पशु के वध के विवाद में समस्त देवों के देव त्रिलोकीनाथ भगवान शंकर को युद्ध के लिए ललकार सके ॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 8.37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  8.37.35 
त्रिभुवनविभुमीश्वरेश्वरं
क इह पुमान् भवमाह्वयेद् युधि।
मृगवधकलहे ऋतेऽर्जुनात्
सुरपतिवीर्यसमप्रभावत:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र के समान बल और प्रभाव वाले अर्जुन के अतिरिक्त इस संसार में और कौन ऐसा पराक्रमी है जो वन्य पशु के वध के विवाद में समस्त देवों के देव त्रिलोकीनाथ भगवान शंकर को युद्ध के लिए ललकार सके ॥ 35॥
 
Besides Arjuna, who had the strength and influence equal to that of Lord Indra, who else in this world is so valiant that he could challenge the God of all Gods, Trilokinath Lord Shankar, for a battle in a dispute over killing a wild animal? ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)