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mahabharat 8.37.32: संजय कहते हैं - हे राजन! युद्ध के उत्साह में शेखी बघारने वाले कर्ण की बातें सुनकर महाबली मद्रराज शल्य उनकी उपेक्षा करके उनका उपहास करने लगे। उन्होंने कर्ण को पुनः ऐसी बातें कहने से रोका और इस प्रकार उत्तर दिया॥32॥   |   mahabharat अध्याय 8.37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  8.37.32 
संजय उवाच
इति रणरभसस्य कत्थत-
स्तदुत निशम्य वच: स मद्रराट्।
अवहसदवमन्य वीर्यवान्
प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं - हे राजन! युद्ध के उत्साह में शेखी बघारने वाले कर्ण की बातें सुनकर महाबली मद्रराज शल्य उनकी उपेक्षा करके उनका उपहास करने लगे। उन्होंने कर्ण को पुनः ऐसी बातें कहने से रोका और इस प्रकार उत्तर दिया॥32॥
 
Sanjaya says - O King! The mighty Madra king Shalya, on hearing the words of Karna who was boasting in the excitement of war, started ignoring them and mocking them. He stopped Karna from saying such things again and replied in this manner.॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)