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mahabharat 8.37.27: गुरुदेव परशुरामजी ने मुझे व्याघ्रचर्म से मढ़ा हुआ और उत्तम घोड़ों से जुता हुआ यह उत्तम रथ दिया है। इसमें तीन स्वर्णमय संदूक और एक चाँदी का त्रिवेणु सुशोभित है। इसके धुरों और पहियों से कोई शब्द नहीं निकलता।॥27॥   |   mahabharat अध्याय 8.37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  8.37.27 
वैयाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं
हैमत्रिकोषं रजतत्रिवेणुम्।
रथप्रबर्हं तुरगप्रबर्है-
र्युक्तं प्रादान्मह्यमिमं हि राम:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
गुरुदेव परशुरामजी ने मुझे व्याघ्रचर्म से मढ़ा हुआ और उत्तम घोड़ों से जुता हुआ यह उत्तम रथ दिया है। इसमें तीन स्वर्णमय संदूक और एक चाँदी का त्रिवेणु सुशोभित है। इसके धुरों और पहियों से कोई शब्द नहीं निकलता।॥27॥
 
‘Gurudev Parashuramji has given me this excellent chariot covered with tiger skin and drawn by excellent horses. It has three golden coffers and a silver Trivenu decorated with it. No sound comes from its axles and wheels.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)