श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  8.37.21 
सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे
पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे।
मया कृत्यमिति जानामि शल्य
प्रयाहि तस्माद् द्विषतामनीकम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
शल्य! (द्रोणाचार्य के मारे जाने के बाद) जब चारों ओर से सहायता की पुकार हो रही हो, स्त्रियाँ और बच्चे बिलख-बिलख कर रो रहे हों और दुर्योधन का पुरुषत्व नष्ट हो गया हो, ऐसे समय दुर्योधन को मेरी सहायता की आवश्यकता है। मैं अपना कर्तव्य भली-भाँति समझता हूँ। अतः तुम्हें शत्रु सेना की ओर जाना चाहिए।
 
‘Shalya! (After Dronacharya was killed) When there is a cry of help from all sides, women and children are crying inconsolably and Duryodhan's manliness has been suppressed, at such a time Duryodhan needs my help. I understand my duty very well. Therefore you should go towards the enemy's army.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas