Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 8.37.18: बहुत विचार करने पर भी मैं कर्म-सम्बन्ध की अनित्यता के कारण इस संसार में किसी भी वस्तु को स्थायी नहीं मानता। जब आचार्य द्रोण भी मारे गए, तब फिर कौन बिना किसी संदेह के यह निश्चय कर सकता है कि अगले सूर्योदय तक कोई जीवित रहेगा?॥18॥ | mahabharat अध्याय 8.37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन । mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन्
विद्यां लोके कर्मणो नित्ययोगात्।
सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो
भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते॥ १८॥
अनुवाद
बहुत विचार करने पर भी मैं कर्म-सम्बन्ध की अनित्यता के कारण इस संसार में किसी भी वस्तु को स्थायी नहीं मानता। जब आचार्य द्रोण भी मारे गए, तब फिर कौन बिना किसी संदेह के यह निश्चय कर सकता है कि अगले सूर्योदय तक कोई जीवित रहेगा?॥18॥
‘Even after much thinking, I do not consider anything in this world to be permanent due to the impermanence of the relation of karma. When even Acharya Drona was killed, then who can have the firm belief without any doubt that one will remain alive till the next sunrise?॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥