| श्री महाभारत » पर्व 8: कर्ण पर्व » अध्याय 37: कौरव-सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल-पराक्रमका वर्णन » श्लोक 11-12 |
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| | | | श्लोक 8.37.11-12  | ततो रथस्थ: परवीरहन्ता
भीष्मद्रोणावस्तवीर्यौ समीक्ष्य।
समुज्ज्वलद्भास्करपावकाभो
वैकर्तनोऽसौ रथकुञ्जरो नृप॥ ११॥
स शल्यमाभाष्य जगाद वाक्यं
पार्थस्य कर्मातिशयं विचिन्त्य।
मानेन दर्पेण विदह्यमान:
क्रोधेन दीप्यन्निव नि:श्वसंश्च॥ १२॥ | | | | | | अनुवाद | | नरेश्वर! तत्पश्चात् सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, शत्रु योद्धाओं का संहार करने में समर्थ और रथियों में श्रेष्ठ कर्ण, रथ पर बैठे हुए भीष्म और द्रोणाचार्य का पराक्रम नष्ट हुआ देखकर अर्जुन के अलौकिक कर्म का विचार करते हुए, अहंकार और क्रोध से जल उठा और मानो क्रोध से जल रहा हो, दीर्घ श्वास लेने लगा। उस समय उसने शल्य को संबोधित करके कहा - 11-12॥ | | | | Nareshwar! Thereafter, Karna, who was bright like the sun and fire, capable of killing the enemy warriors, and the best of the charioteers, sitting on the chariot, seeing that the bravery of Bhishma and Dronacharya had vanished, thinking about the supernatural action of Arjuna, got burnt with pride and anger and started drawing long breaths as if burning with anger. At that time he addressed Shalya and said – 11-12॥ | | ✨ ai-generated | | |
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