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श्लोक 8.35.48  |
तत: पार्थेन संग्रामे युध्यमानस्य तेऽनघ।
वाहयिष्यामि तुरगान् विज्वरो भव सूतज॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| हे निष्पाप सारथिपुत्र कर्ण! जब तुम रणभूमि में अर्जुन के साथ युद्ध करोगे, तब मैं तुम्हारे घोड़ों को अवश्य हांकूँगा। तुम निश्चिंत रहो।॥48॥ |
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| O sinless charioteer's son Karna! When you fight with Arjuna on the battlefield, I will surely drive your horses. You can be worry free. ॥ 48॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्यस्वीकारे पञ्चत्रिंशोऽध्याय:॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यके सारथिकर्मको स्वीकार करनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥
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