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mahabharat 8.35.45: शल्य बोले - अपनी निन्दा और प्रशंसा, पर-निन्दा और पर-प्रशंसा - ये चार प्रकार के आचरण महापुरुषों ने कभी नहीं किए हैं ॥45॥   |   mahabharat अध्याय 8.35: शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 35: शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  8.35.45 
शल्य उवाच
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तव:।
अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
शल्य बोले - अपनी निन्दा और प्रशंसा, पर-निन्दा और पर-प्रशंसा - ये चार प्रकार के आचरण महापुरुषों ने कभी नहीं किए हैं ॥45॥
 
Shalya said – Criticism and praise of oneself, criticism of others and praise of others – these four types of behavior have never been done by great men. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)