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शल्य उवाच
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तव:।
अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम्॥ ४५॥
अनुवाद
शल्य बोले - अपनी निन्दा और प्रशंसा, पर-निन्दा और पर-प्रशंसा - ये चार प्रकार के आचरण महापुरुषों ने कभी नहीं किए हैं ॥45॥
Shalya said – Criticism and praise of oneself, criticism of others and praise of others – these four types of behavior have never been done by great men. 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥