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mahabharat 8.34.51: महेश्वर ने उस बाण में अपना असह्य एवं भयंकर क्रोध तथा भृगु और अंगिरा के क्रोध से उत्पन्न होने वाली अत्यन्त पीड़ादायक क्रोधाग्नि भी रख दी ॥51॥   |   mahabharat अध्याय 8.34: दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 34: दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  8.34.51 
तस्मिन् शरे तिग्ममन्युं मुमोचासह्यमीश्वर:।
भृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदु:सहम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
महेश्वर ने उस बाण में अपना असह्य एवं भयंकर क्रोध तथा भृगु और अंगिरा के क्रोध से उत्पन्न होने वाली अत्यन्त पीड़ादायक क्रोधाग्नि भी रख दी ॥51॥
 
Maheshwar also placed in that arrow his unbearable and fierce anger and the extremely painful fire of anger arising from the anger of Bhrigu and Angira. 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)