श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 34: दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना  »  श्लोक 33-35h
 
 
श्लोक  8.34.33-35h 
धर्म: सत्यं तपोऽर्थश्च विहितास्तत्र रश्मय:॥ ३३॥
अधिष्ठानं मनश्चासीत् परिरथ्या सरस्वती।
नानावर्णाश्च चित्राश्च पताका: पवनेरिता:॥ ३४॥
विद्युदिन्द्रधनुर्नद्धं रथं दीप्तं व्यदीपयन्।
 
 
अनुवाद
धर्म, सत्य, तप और अर्थ - ये वहाँ लगाम बनाए गए थे। रथ का आधार मन था और देवी सरस्वती रथ को आगे बढ़ाने का मार्ग थीं। वायु से प्रेरित होकर नाना प्रकार के रंगों की विचित्र ध्वजाएँ लहरा रही थीं, जो बिजली और इन्द्रधनुष से युक्त उस जगमगाते रथ की शोभा बढ़ा रही थीं। 33-34 1/2।
 
Dharma, Satya, Tapa and Artha – these were made the reins there. The base of the chariot was the mind and Goddess Saraswati was the path for the chariot to move forward. Strange flags of various colors were fluttering inspired by the wind, which were enhancing the beauty of that shining chariot tied with lightning and rainbow. 33-34 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)