श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 34: दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  8.34.3 
तानतिक्रान्तमर्यादान् नान्य: संहर्तुमर्हति।
त्वामृते भूतभव्येश त्वं ह्येषां प्रत्यरिर्वधे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उस वरदान को पाकर उसने मर्यादा का उल्लंघन किया है। हे भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी महेश्वर! आपके अतिरिक्त उसे कोई नहीं मार सकता। उसके वध के लिए आप ही विरोधी शत्रु हो सकते हैं।॥3॥
 
‘By receiving that boon, he has violated the decorum. O Lord of the past, present and future, Maheshwar! No one else can kill him except you. You alone can be the opposing enemy for his killing.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)