श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 34: दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  8.34.25 
अहोरात्रं कलाश्चैव काष्ठाश्च ऋतवस्तथा।
अनुकर्षं ग्रहा दीप्ता वरूथं चापि तारका:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
दिन, रात्रि, काल, काष्ठ और छह ऋतुएँ रथ की अनुकर्षा (नीचे की लकड़ी) बन गईं। चमकते हुए ग्रह और तारे वरूथ (रथ की रक्षा करने वाला आवरण) बन गए॥25॥
 
Day, night, Kala, Kashtha and the six seasons became the Anukrsha (lower wood) of the chariot. The shining planets and stars became Varutha (covering to protect the chariot).॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)