श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 34: दुर्योधनका शल्यको शिवके विचित्र रथका विवरण सुनाना और शिवजीद्वारा त्रिपुर-वधका उपाख्यान सुनाना एवं परशुरामजीके द्वारा कर्णको दिव्य अस्त्र मिलनेकी बात कहना  »  श्लोक 154-155h
 
 
श्लोक  8.34.154-155h 
निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद् रुजा।
तया ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन॥ १५४॥
गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद् यथेप्सितम्।
 
 
अनुवाद
उन्होंने कहा, 'हे भृगु नन्दन! दैत्यों के शस्त्रों से तुम्हारे शरीर को जो चोट पहुँची है, उससे तुम्हारा मनुष्यत्व नष्ट हो गया है (अब तुम देवताओं के समान हो गए हो); अतः मुझसे अपनी इच्छानुसार दिव्यास्त्र स्वीकार करो।'॥154 1/2॥
 
He said, 'O Bhrigu Nandan! The injury caused to your body by the weapons of the demons has destroyed your human nature (now you have become like the gods); therefore, accept the divine weapon of your choice from me.'॥ 154 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)