श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 55-56
 
 
श्लोक  8.33.55-56 
नमो देवाधिदेवाय धन्विने वनमालिने॥ ५५॥
प्रजापतिमखघ्नाय प्रजापतिभिरीड्यते।
नम: स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय शम्भवे॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
आप देवताओं के अधिष्ठाता, धनुर्धर और वनमाला धारण करने वाले हैं। आपको नमस्कार है। आप दक्ष प्रजापति के यज्ञ के विध्वंसक हैं, प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं, सभी ने आपकी स्तुति की है, आप स्तुति के योग्य हैं और सभी आपकी स्तुति करते हैं। हे शिव, आप जो मंगल के स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।
 
‘You are the presiding deity of the gods, the archer and the bearer of the forest garland. Salutations to you. You are the destroyer of the sacrifice of Daksha Prajapati, Prajapati also praises you, you have been praised by all, you are worthy of praise and everyone praises you. Salutations to you, Lord Shiva, who is the embodiment of auspiciousness.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)