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mahabharat 8.33.51-52h: उन्होंने अपनी-अपनी भावनाओं के अनुसार एक ही भगवान शिव की अनेक रूपों में कल्पना की। उन्होंने उस परम पुरुष में अपना और दूसरों का प्रतिबिंब देखा। यह सब देखकर वे सब एक-दूसरे की ओर देखने लगे और अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए।   |   mahabharat अध्याय 8.33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 51-52h
 
 
श्लोक  8.33.51-52h 
एकं च भगवन्तं ते नानारूपमकल्पयन्।
आत्मन: प्रतिरूपाणि रूपाण्यथ महात्मनि॥ ५१॥
परस्परस्य चापश्यन् सर्वे परमविस्मिता:।
 
 
अनुवाद
उन्होंने अपनी-अपनी भावनाओं के अनुसार एक ही भगवान शिव की अनेक रूपों में कल्पना की। उन्होंने उस परम पुरुष में अपना और दूसरों का प्रतिबिंब देखा। यह सब देखकर वे सब एक-दूसरे की ओर देखने लगे और अत्यंत आश्चर्यचकित हो गए।
 
They imagined the same Lord Shiva in many forms according to their feelings. They saw their own and others' reflections in that Supreme Being. Seeing all this, they all looked at each other and became very surprised. 51 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)