श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  8.33.49-50 
तपोविशेषैर्विविधैर्योगं यो वेद चात्मन:।
य: सांख्यमात्मनो वेत्ति यस्य चात्मा वशे सदा॥ ४९॥
तं ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम्।
अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जो विविध विशेष तपों द्वारा मन की समस्त वृत्तियों को वश में करने का उपाय जानते हैं, जो अपने वास्तविक स्वरूप से सदैव परिचित रहते हैं, जिनका अन्तःकरण सदैव उनके वश में रहता है, जिनकी संसार में कहीं भी तुलना नहीं है, उन पापरहित, तेजस्वी, महेश्वर भगवान उमापति को उन देवताओं ने देखा ॥49-50॥
 
Those who know the means of controlling all the tendencies of the mind through various special austerities, who are always aware of their true nature, whose conscience is always under their control, who have no comparison anywhere in the world, those sinless, radiant, Maheshwar Lord Umapati were seen by those gods. ॥ 49-50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)