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mahabharat 8.33.30-31h: राक्षस जिस रूप और वेश में रहता था, मरने के बाद जब उसे कुएँ में फेंका जाता था, तो वह उसी रूप और वेश में प्रकट होता था।   |   mahabharat अध्याय 8.33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 30-31h
 
 
श्लोक  8.33.30-31h 
येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह॥ ३०॥
मृतस्तस्यां परिक्षिप्तस्तादृशेनैव जज्ञिवान्।
 
 
अनुवाद
राक्षस जिस रूप और वेश में रहता था, मरने के बाद जब उसे कुएँ में फेंका जाता था, तो वह उसी रूप और वेश में प्रकट होता था।
 
Whatever form and attire the demon used to live in, after his death, when thrown into the well, he used to appear in the same form and attire. 30 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)