श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  8.33.15-16 
एवमस्त्विति तान् देव: प्रत्युक्त्वा प्राविशद् दिवम्।
ते तु लब्धवरा: प्रीता: सम्प्रधार्य परस्परम्॥ १५॥
पुरत्रयविसृष्ट्यर्थं मयं वव्रुर्महासुरम्।
विश्वकर्माणमजरं दैत्यदानवपूजितम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
भगवान ब्रह्माजी ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर अपने धाम को चले गए। वे तीनों दैत्य वर पाकर बहुत प्रसन्न हुए और आपस में विचार-विमर्श करके उन्होंने दैत्यों द्वारा पूजित, अमर मय दानव विश्वकर्मा को तीन नगरों के निर्माण के लिए चुना। 15-16॥
 
Saying ‘Evamastu’ (so be it) Lord Brahma went to his abode. Those three demons were very happy after receiving the boon and after discussing with each other, they chose the demon-demon-worshipped, immortal Vishwakarma, the great demon Maya, for the construction of three cities. 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)