श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 33: दुर्योधनका शल्यसे त्रिपुरोंकी उत्पत्तिका वर्णन, त्रिपुरोंसे भयभीत इन्द्र आदि देवताओंका ब्रह्माजीके साथ भगवान् शंकरके पास जाकर उनकी स्तुति करना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  8.33.13-14 
ततो वर्षसहस्रे तु समेष्याम: परस्परम्।
एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ॥ १३॥
समागतानि चैतानि यो हन्याद् भगवंस्तदा।
एकेषुणा देववर: स नो मृत्युर्भविष्यति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अनघ! तत्पश्चात् एक हजार वर्ष पूर्ण होने पर हम लोग एक दूसरे से मिलेंगे। हे प्रभु! जब ये तीनों नगर मिलकर एक हो जाएँगे, तब जो इन तीनों नगरों को एक ही बाण से नष्ट कर सकेगा, वही देवेश्वर हमारी मृत्यु का कारण होगा॥13-14॥
 
Anagha! Thereafter, after the completion of one thousand years, we will meet each other. O Lord! When these three cities come together and become one, then the one who can destroy these three cities with a single arrow, that Deveshwar will be the cause of our death.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)