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mahabharat 8.32.31: महाबाहु शल्य को अपने वंश, धन, शास्त्र-ज्ञान और बल का बड़ा अभिमान था। क्रोध से लाल हो चुकी अपनी विशाल आँखें घुमाते हुए वे इस प्रकार बोले।   |   mahabharat अध्याय 8.32: दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुन: श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 32: दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना और शल्यका इस विषयमें घोर विरोध करना, पुन: श्रीकृष्णके समान अपनी प्रशंसा सुनकर उसे स्वीकार कर लेना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  8.32.31 
क्रोधरक्ते महानेत्रे परिवृत्य महाभुज:।
कुलैश्वर्यश्रुतबलैर्दृप्त: शल्योऽब्रवीदिदम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
महाबाहु शल्य को अपने वंश, धन, शास्त्र-ज्ञान और बल का बड़ा अभिमान था। क्रोध से लाल हो चुकी अपनी विशाल आँखें घुमाते हुए वे इस प्रकार बोले।
 
Mahabahu Shalya was very proud of his lineage, wealth, knowledge of scriptures and strength. Rolling his huge eyes red with anger, he spoke thus.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)