श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 31: रात्रिमें कौरवोंकी मन्त्रणा, धृतराष्ट्रके द्वारा दैवकी प्रबलताका प्रतिपादन, संजयद्वारा धृतराष्ट्रपर दोषारोप तथा कर्ण और दुर्योधनकी बातचीत  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  8.31.52 
ज्या तस्य धनुषो दिव्या तथाक्षय्ये महेषुधी।
सारथिस्तस्य गोविन्दो मम तादृङ् न विद्यते॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
उनके धनुष की डोरी दिव्य है, उनके पास दो बड़े दिव्य तरकश हैं जो कभी खाली नहीं होते और उनके सारथी श्रीकृष्ण हैं; ये सब वस्तुएँ मेरे पास नहीं हैं ॥52॥
 
The string of his bow is divine. He has two large divine quivers which are never empty and his charioteer is Sri Krishna; I do not have these things. ॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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