श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 28: युधिष्ठिर और दुर्योधनका युद्ध, दुर्योधनकी पराजय तथा उभयपक्षकी सेनाओंका अमर्यादित भयंकर संग्राम  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  8.28.24-25 
पदातीनां तु सहसा प्रद्रुतानां महाहवे।
उत्सृज्याभरणं तूर्णमवप्लुत्य रणाजिरे॥ २४॥
निमित्तं मन्यमानास्तु परिणाम्य महागजा:।
जगृहुर्बिभिदुश्चैव चित्राण्याभरणानि च॥ २५॥
 
 
अनुवाद
पैदल सेनाएँ युद्धभूमि में अपने आभूषणों को त्यागकर तुरन्त ही बड़े वेग से उछलने और दौड़ने लगती थीं। उस समय हाथी भागती हुई पैदल सेना के विचित्र आभूषणों को बहाना समझकर अचानक उन पर आक्रमण कर देते थे और उन्हें अपनी सूँडों से उठाकर दाँतों से कुचलकर तोड़ डालते थे॥ 24-25॥
 
The infantry, having abandoned their ornaments on the battlefield, immediately began to jump and run at great speed. At that time, the elephants would suddenly consider the strange ornaments of the fleeing infantry as an excuse to attack them and pick them up with their trunks and then crush them with their teeth and break them.॥ 24-25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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