तमब्रवीत्तत: कर्णो व्यर्थं व्याहृतवानसि।
वदेदानीं पुनर्हृष्टो वध्यमान: पुन: पुन:॥ ४८॥
मा योत्सी: कुरुभि: सार्धं बलवद्भिश्च पाण्डव।
सदृशैस्तात युध्यस्व व्रीडां मा कुरु पाण्डव॥ ४९॥
गृहं वा गच्छ माद्रेय यत्र वा कृष्णफाल्गुनौ।
एवमुक्त्वा महाराज व्यसर्जयत तं तदा॥ ५०॥
अनुवाद
उस समय कर्ण ने नकुल से कहा, 'पाण्डुकुमार! तुमने व्यर्थ ही बढ़ा-चढ़ाकर अपनी बातें कही थीं। अब मेरे बाणों से बार-बार पीड़ित होकर तुम पुनः उसी प्रकार प्रसन्नतापूर्वक बातें करो। आज से तुम बलवान कौरव योद्धाओं के साथ युद्ध न करो। हे प्रिय! केवल उन्हीं के साथ युद्ध करो जो तुम्हारे समान हों। माद्रीकुमार! लज्जित मत हो। यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो घर चले जाओ अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं, वहाँ भाग जाओ।' महाराज! ऐसा कहकर कर्ण ने नकुल को छोड़ दिया। 48-50।
At that time Karna said to Nakula, 'Pandukumar! You had unnecessarily exaggerated your stories. Now, after being repeatedly hit by my arrows, you should again talk in the same way with the same joy. From today onwards, do not fight with the powerful Kaurava warriors. O dear! Fight only with those who are equal to you. Madrikumar! Do not be ashamed. If you wish, go home or run away to where Shri Krishna and Arjun are.' Maharaj! Saying this, Karna then left Nakula. 48-50.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥