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श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 24: नकुल और कर्णका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा नकुलकी पराजय और पांचाल-सेनाका संहार  »  श्लोक 45-46h
 
 
श्लोक  8.24.45-46h 
तमभिद्रुत्य राधेय: प्रहसन् वै पुन: पुन:॥ ४५॥
सज्यमस्य धनु: कण्ठे व्यवासृजत भारत।
 
 
अनुवाद
भरत! राधापुत्र कर्ण ने बार-बार हँसते हुए उसका पीछा किया और अपने धनुष की डोरी उसके गले में डाल दी।
 
Bhaarata! Radha's son Karna, laughing repeatedly, pursued him and put his bow with the string around his neck.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)