संजय उवाच
भीष्मद्रोणकृपद्रौणिकर्णार्जुनजनार्दनान्।
समाप्तविद्यान् धनुषि श्रेष्ठान् यान् मन्यसे रथान्॥ ३॥
यो ह्याक्षिपति वीर्येण सर्वानेतान् महारथान्।
न मेने चात्मना तुल्यं कंचिदेव नरेश्वरम्॥ ४॥
तुल्यतां द्रोणभीष्माभ्यामात्मनो यो न मृष्यते।
वासुदेवार्जुनाभ्यां च न्यूनतां नैच्छतात्मनि॥ ५॥
स पाण्ड्यो नृपतिश्रेष्ठ: सर्वशस्त्रभृतां वर:।
कर्णस्यानीकमहनत् पराभूत इवान्तक:॥ ६॥
अनुवाद
संजय बोले - हे राजन! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण, अर्जुन और श्रीकृष्ण आदि जिन वीरों को आप पूर्ण विद्वान, धनुर्विद्या में श्रेष्ठ और महान योद्धा मानते हैं, उन सब महारथियों को वह अपने पराक्रम के सामने तुच्छ समझता था, जो किसी राजा को अपने समान नहीं समझता था, जो द्रोण और भीष्म के साथ अपनी तुलना सहन नहीं कर सकता था और जो श्रीकृष्ण और अर्जुन के सामने किंचितमात्र भी हीनता स्वीकार नहीं करना चाहता था, वही समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राजा पाण्ड्य अपमानित यमराज के समान कुपित होकर कर्ण की सेना का संहार करने लगा।
Sanjaya said - O King! Bhishma, Drona, Kripacharya, Ashwatthama, Karna, Arjuna and Shri Krishna etc., the heroes whom you consider to be fully learned, best in the archery Veda and great warriors, he considered all these great warriors as insignificant in front of his valour, who did not consider any king to be his equal, who could not tolerate his comparison with Drona and Bhishma and who did not wish to accept even the slightest inferiority in front of Shri Krishna and Arjuna, that very king Pandya, the best among all weapon wielders, became enraged like the insulted Yamaraja and started killing Karna's army.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥