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श्लोक 8.20.25-26  |
दिव्यं धनुरथाधिज्यं कृत्वा द्रौणिरमित्रहा।
प्रेक्ष्य चाशु रथे युक्तान् नरैरन्यान् हयोत्तमान्॥ २५॥
तत: शरसहस्राणि प्रेषयामास वै द्विज:।
इषुसम्बाधमाकाशमकरोद् दिश एव च॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| तब शत्रुघ्न द्रोण के पुत्र महाब्राह्मण अश्वत्थामा ने अपने दिव्य धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर यह देखा कि मेरे सेवकों ने शीघ्रतापूर्वक अन्य उत्तम घोड़े लाकर मेरे रथ में जोत दिए हैं, तब उसने हजारों बाण छोड़े और आकाश तथा समस्त दिशाओं को अपने बाणों से भर दिया। |
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| Then Shatrughan Drona's son, the great Brahmin Ashvatthama, having strung his divine bow and seeing that his servants had quickly brought other excellent horses and yoked them to his chariot, shot thousands of arrows and filled the sky and all directions with his arrows. |
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