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mahabharat 8.18.15: वह हाथी अत्यन्त पीड़ा में भरकर मेघ के समान गर्जना करता हुआ, इधर-उधर भटकता, कभी पीछे मुड़ता, कभी लड़खड़ाता, कभी दौड़ता। वह अत्यन्त घायल होकर महावतों सहित भूमि पर गिर पड़ा; मानो वज्र से छेदा हुआ पर्वत टूट पड़ा हो॥15॥   |   mahabharat अध्याय 8.18: अर्जुनके द्वारा हाथियोंसहित दण्डधार और दण्ड आदिका वध तथा उनकी सेनाका पलायन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 18: अर्जुनके द्वारा हाथियोंसहित दण्डधार और दण्ड आदिका वध तथा उनकी सेनाका पलायन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  8.18.15 
स वेदनार्तोऽम्बुदनिस्वनो नदं-
श्चरन् भ्रमन् प्रस्खलितान्तरोऽद्रवत्।
पपात रुग्ण: सनियन्तृकस्तथा
यथा गिरिर्वज्रविदारितस्तथा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वह हाथी अत्यन्त पीड़ा में भरकर मेघ के समान गर्जना करता हुआ, इधर-उधर भटकता, कभी पीछे मुड़ता, कभी लड़खड़ाता, कभी दौड़ता। वह अत्यन्त घायल होकर महावतों सहित भूमि पर गिर पड़ा; मानो वज्र से छेदा हुआ पर्वत टूट पड़ा हो॥15॥
 
The elephant, in great pain, roared like a cloud, wandered everywhere, turned around and stumbled at times, and ran. Being severely wounded, he fell to the ground along with the mahouts; as if a mountain pierced by a thunderbolt had collapsed.॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)