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mahabharat 8.15.10: इसी प्रकार हर्ष और उत्साह में भरे हुए पाण्डवपुत्र भीमसेन भी युद्ध में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पर सैकड़ों तीखे बाणों का प्रहार करके उसे विचलित नहीं कर सके, जैसे जल का प्रचण्ड प्रवाह पर्वत को हिला नहीं सकता॥10॥   |   mahabharat अध्याय 8.15: अश्वत्थामा और भीमसेनका अद्भुत युद्ध तथा दोनोंका मूर्च्छित हो जाना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 15: अश्वत्थामा और भीमसेनका अद्भुत युद्ध तथा दोनोंका मूर्च्छित हो जाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  8.15.10 
तथैव पाण्डवो युद्धे द्रौणिं शरशतै: शितै:।
नाकम्पयत संहृष्टो वार्योघ इव पर्वतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार हर्ष और उत्साह में भरे हुए पाण्डवपुत्र भीमसेन भी युद्ध में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पर सैकड़ों तीखे बाणों का प्रहार करके उसे विचलित नहीं कर सके, जैसे जल का प्रचण्ड प्रवाह पर्वत को हिला नहीं सकता॥10॥
 
Similarly, Pandava's son Bhimasena, filled with joy and enthusiasm, could not disturb Drona's son Ashwatthama by attacking him with hundreds of sharp arrows in the war. Just like a great flow of water cannot move a mountain.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)