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mahabharat 8.10.4-5: भरत! इस प्रकार अपनी सेना को संगठित करके, जो अपने उद्देश्य में सफल हो चुकी थी और बड़ी प्रसन्नता के साथ युद्ध कर रही थी, दुर्योधन अपने बाहुबल का आश्रय लेकर अपने विरोधी पाण्डवों के साथ बहुत समय तक युद्ध करता रहा और जब संध्या हो गई, तब उसने अपने सैनिकों को शिविर में लौट जाने का आदेश दिया। ॥4-5॥   |   mahabharat अध्याय 8.10: कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 10: कर्णको सेनापति बनानेके लिये अश्वत्थामाका प्रस्ताव और सेनापतिके पदपर उसका अभिषेक  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  8.10.4-5 
स्वमनीकमवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रित:।
युद्‍ध्वा च सुचिरं कालं पाण्डवै: सह भारत॥ ४॥
लब्धलक्ष्यै: परैर्हृष्टैर्व्यायच्छद्भिश्चिरं तदा।
संध्याकालं समासाद्य प्रत्याहारमकारयत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भरत! इस प्रकार अपनी सेना को संगठित करके, जो अपने उद्देश्य में सफल हो चुकी थी और बड़ी प्रसन्नता के साथ युद्ध कर रही थी, दुर्योधन अपने बाहुबल का आश्रय लेकर अपने विरोधी पाण्डवों के साथ बहुत समय तक युद्ध करता रहा और जब संध्या हो गई, तब उसने अपने सैनिकों को शिविर में लौट जाने का आदेश दिया। ॥4-5॥
 
Bhaarata! Having thus established his army, who had achieved their objective and were therefore fighting diligently with great joy, Duryodhana, relying on his own physical strength, fought for a long time with his opponents, the Pandavas, and when the evening came, he ordered his soldiers to return to the camp. ॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)