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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 98: द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  7.98.6-7 
शरपातमहावर्षं रथघोषबलाहकम्।
कार्मुकाकर्षविक्षेपं नाराचबहुविद्युतम्॥ ६॥
शक्तिखड्गाशनिधरं क्रोधवेगसमुत्थितम्।
द्रोणमेघमनावार्यं हयमारुतचोदितम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
उस समय द्रोणाचार्य अश्वरूपी वायु से चलने वाले मेघ के समान थे। बाणों का प्रहार ही उनके द्वारा की गई भारी वर्षा थी। रथ की घरघराहट ही मेघ की गर्जना थी, धनुष का खींचना ही निरन्तर वर्षा का साधन था, बहुत से बाण विद्युत के समान चमक रहे थे, वह मेघ तलवार और तेजरूपी अग्नि धारण किए हुए था और क्रोध के बल से उठ रहा था।
 
At that time Dronacharya was like a wind-driven cloud in the form of a horse. The attack of arrows was the heavy rain caused by him. The rattling of the chariot was the roar of the cloud, the drawing of the bow was the means of continuous rain, many arrows were shining like electricity, that cloud was holding a sword and the fire of power and it rose with the force of anger. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)