Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 7.98.3-4h: संजय ने कहा, "महाराज! उस समय क्रोध और क्षोभ से लाल आँखें किए हुए द्रोणाचार्य ने बड़े वेग से, बड़े सर्प के समान फुफकारते हुए सात्यकि पर आक्रमण किया। क्रोध ही उस महासर्प का विष था। खींचा हुआ धनुष खुले हुए मुख के समान प्रतीत हो रहा था, तीखे बाण दाँतों के समान थे और तीखे बाण दाढ़ों के समान कार्य कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 7.98: द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 98: द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध  »  श्लोक 3-4h
 
 
श्लोक  7.98.3-4h 
संजय उवाच
सम्प्रद्रुत: क्रोधविषो व्यादितास्यशरासन:।
तीक्ष्णधारेषुदशन: शितनाराचदंष्ट्रवान्॥ ३॥
संरम्भामर्षताम्राक्षो महोरग इव श्वसन्।
 
 
अनुवाद
संजय ने कहा, "महाराज! उस समय क्रोध और क्षोभ से लाल आँखें किए हुए द्रोणाचार्य ने बड़े वेग से, बड़े सर्प के समान फुफकारते हुए सात्यकि पर आक्रमण किया। क्रोध ही उस महासर्प का विष था। खींचा हुआ धनुष खुले हुए मुख के समान प्रतीत हो रहा था, तीखे बाण दाँतों के समान थे और तीखे बाण दाढ़ों के समान कार्य कर रहे थे।
 
Sanjaya said, "Maharaj! At that time Dronacharya, his eyes turning red with anger and resentment, attacked Satyaki with great speed, hissing like a great serpent. Anger was the poison of that great serpent. The drawn bow looked like a wide-open mouth, the sharp arrows were like teeth and the sharp arrows acted like molars.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)