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mahabharat 7.98.14: जैसे वर्षा ऋतु में दो बादल एक दूसरे पर जल की धाराएँ बरसाते हैं, वैसे ही वे एक दूसरे पर बाणों की वर्षा कर रहे थे। उस समय न तो सूर्य दिखाई दे रहा था और न वायु चल रही थी॥14॥   |   mahabharat अध्याय 7.98: द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 98: द्रोणाचार्य और सात्यकिका अद्भुत युद्ध  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.98.14 
मेघाविवातपापाये धाराभिरितरेतरम्।
न स्म सूर्यस्तदा भाति न ववौ च समीरण:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जैसे वर्षा ऋतु में दो बादल एक दूसरे पर जल की धाराएँ बरसाते हैं, वैसे ही वे एक दूसरे पर बाणों की वर्षा कर रहे थे। उस समय न तो सूर्य दिखाई दे रहा था और न वायु चल रही थी॥14॥
 
Just as two clouds pour streams of water on each other during the rainy season, similarly they were showering arrows on each other. At that time neither the sun was visible nor the wind was blowing.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)