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श्लोक  7.95.31 
तत् पच्यमानमर्केण द्रोणसायकतापितम्।
बभ्राम पार्षतं सैन्यं तत्र तत्रैव भारत॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे भरतपुत्र! द्रोणाचार्य के बाणों से पीड़ित होकर धृष्टद्युम्न की सेना मानो सूर्य की किरणों से तपी हुई हो, इधर-उधर भागने लगी।
 
O son of Bharata! As if being baked by the rays of the Sun, Dhrishtadyumna's army, tormented by Dronacharya's arrows, began to run here and there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)