श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 92: अर्जुनका द्रोणाचार्य और कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए कौरव-सेनामें प्रवेश तथा श्रुतायुधका अपनी गदासे और सुदक्षिणका अर्जुनद्वारा वध  »  श्लोक 72-73
 
 
श्लोक  7.92.72-73 
गिरे: शिखरज: श्रीमान् सुशाख: सुप्रतिष्ठित:॥ ७२॥
निर्भग्न इव वातेन कर्णिकारो हिमात्यये।
शेते स्म निहतो भूमौ काम्बोजास्तरणोचित:॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार शीत ऋतु के पश्चात पर्वत की चोटी पर उगने वाला सुस्थिर एवं सुन्दर कनेर का वृक्ष वायु के वेग से टूटकर गिर जाता है, उसी प्रकार कम्बोज देश की कोमल शय्याओं पर शयन करने योग्य सुदक्षिण भी मारा जाने पर वहीं भूमि पर शयन कर रहा था।
 
Just as a well-established and beautiful oleander tree growing on the top of a mountain after the winter season breaks and falls due to the force of the wind, similarly Sudakshin, who was worthy of sleeping on the soft beds of Kamboja country, was sleeping on the ground after being killed there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)