ततोऽब्रवीत् स्वयं द्रोण: क्वेदं पाण्डव गम्यते।
ननु नाम रणे शत्रुमजित्वा न निवर्तसे॥ ३३॥
अनुवाद
यह देखकर द्रोणाचार्य ने स्वयं कहा - 'हे पाण्डुपुत्र! तुम इस प्रकार कहाँ जा रहे हो? तुम तो युद्धभूमि से शत्रु को पराजित किये बिना कभी नहीं लौटे।'
Seeing this, Dronacharya himself said - 'O son of Pandu! Where are you going like this? You never returned from the battlefield without defeating the enemy.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)