श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 91: अर्जुन और द्रोणाचार्यका वार्तालाप तथा युद्ध एवं द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़े हुए अर्जुनका कौरव-सैनिकोंद्वारा प्रतिरोध  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  7.91.12-13 
इयेष पाण्डवस्तस्य बाणैश्छेत्तुं शरासनम्।
तस्य चिन्तयतस्त्वेवं फाल्गुनस्य महात्मन:॥ १२॥
द्रोण: शरैरसम्भ्रान्तो ज्यां चिच्छेदाशु वीर्यवान्।
विव्याध च हयानस्य ध्वजं सारथिमेव च॥ १३॥
 
 
अनुवाद
तब पाण्डवपुत्र अर्जुन ने अपने बाणों से द्रोणाचार्य का धनुष काट डालने की इच्छा की। महामना अर्जुन अभी ऐसा विचार ही कर रहे थे कि वीर द्रोणाचार्य ने बिना किसी घबराहट के अपने बाणों से उनके धनुष की डोरी काट डाली तथा अर्जुन के घोड़ों, ध्वजा और सारथि को भी बींध डाला॥12-13॥
 
Then Pandava's son Arjuna desired to cut off Dronacharya's bow with his arrows. Mahamana Arjuna was still thinking like this when the valiant Dronacharya without any panic cut off his bow's string with his arrows and also pierced Arjuna's horses, flag and charioteer.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)