श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 87: कौरव-सैनिकोंका उत्साह तथा आचार्य द्रोणके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.87.3 
विस्फार्य च धनूंष्यन्ये ज्या: परे परिमृज्य च।
विनि:श्वसन्त: प्राक्रोशन् क्वेदानीं स धनंजय:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
कोई धनुष खींच रहे थे, कोई प्रत्यंचा झुला रहे थे और कोई क्रोध से आहें भरते हुए चिल्ला रहे थे कि इस समय अर्जुन कहाँ है॥3॥
 
Some, pulling the bow, some swinging the string, and some, sighing in anger, were shouting, asking where Arjuna was at this moment.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)