vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 7: द्रोण पर्व
»
अध्याय 87: कौरव-सैनिकोंका उत्साह तथा आचार्य द्रोणके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण
»
श्लोक 3
श्लोक
7.87.3
विस्फार्य च धनूंष्यन्ये ज्या: परे परिमृज्य च।
विनि:श्वसन्त: प्राक्रोशन् क्वेदानीं स धनंजय:॥ ३॥
अनुवाद
कोई धनुष खींच रहे थे, कोई प्रत्यंचा झुला रहे थे और कोई क्रोध से आहें भरते हुए चिल्ला रहे थे कि इस समय अर्जुन कहाँ है॥3॥
Some, pulling the bow, some swinging the string, and some, sighing in anger, were shouting, asking where Arjuna was at this moment.॥ 3॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×