| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 85: धृतराष्ट्रका विलाप » श्लोक 43-44h |
|
| | | | श्लोक 7.85.43-44h  | दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणान् प्रसहेद् वा परान् मम।
अन्यो दुर्योधनात् कर्णाच्छकुनेश्चापि सौबलात्॥ ४३॥
दु:शासनचतुर्थानां नान्यं पश्यामि पञ्चमम्। | | | | | | अनुवाद | | अथवा मैं दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और चौथे दु:शासन के अतिरिक्त किसी पाँचवें वीर को नहीं देखता जो दिव्यास्त्रधारी मेरे इन शत्रुओं के आक्रमण का सामना कर सके। ॥43 1/2॥ | | | | Or I do not see any fifth brave person other than Duryodhana, Karna, Subala's son Shakuni and the fourth Dushasan who can withstand the onslaught of these enemies of mine who wield divine weapons. ॥ 43 1/2 ॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|