|
| |
| |
श्लोक 7.85.32  |
अर्हास्ते पृथिवीं भोक्तुं समर्था: साधनेऽपि च।
तेषामपि समुद्रान्ता पितृपैतामही मही॥ ३२॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| पाण्डव पृथ्वी का राज्य भोगने में समर्थ हैं और उसे प्राप्त करने में भी समर्थ हैं। समुद्रपर्यन्त यह पृथ्वी भी उनके पूर्वजों की है॥ 32॥ |
| |
| ‘The Pandavas are capable of enjoying the kingdom of the earth and also of acquiring it. This earth up to the sea belongs to their forefathers as well.॥ 32॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|