श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 85: धृतराष्ट्रका विलाप  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  7.85.21-22 
यदा प्रभृत्युपप्लव्याच्छान्तिमिच्छञ्जनार्दन:॥ २१॥
आगत: सर्वभूतानामनुकम्पार्थमच्युत:।
ततोऽहमब्रुवं सूत मन्दं दुर्योधनं तदा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
संजय! जब कभी भी अपना तेज न खोने वाले भगवान जनार्दन शांति स्थापित करने तथा समस्त प्राणियों पर दया करने की इच्छा से उपप्लव्य से हस्तिनापुर आये, उस समय मैंने अपने मूर्ख पुत्र दुर्योधन से इस प्रकार कहा था -॥ 21-22॥
 
Sanjay! When Lord Janardana, who never loses his glory, came to Hastinapur from Upaplavya with the desire to establish peace and to show mercy to all living beings, at that time I had told my foolish son Duryodhana thus -॥ 21-22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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