श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 85: धृतराष्ट्रका विलाप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.85.2 
जानन्तस्तस्य कर्माणि कुरव: सव्यसाचिन:।
कथं तत् किल्बिषं कृत्वा निर्भया ब्रूहि मामका:॥ २॥
 
 
अनुवाद
मेरे पक्ष के कौरव योद्धा सव्यसाची अर्जुन के पराक्रम को जानते हुए भी उसके विरुद्ध अपराध करके निर्भय कैसे रह सके? यह मुझे बताइए॥2॥
 
How could the Kaurava warriors on my side remain fearless after committing crimes against him, despite knowing the might of Savyasachi Arjun? Tell me this. ॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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