श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 84: युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  7.84.34 
न हि यत्र महाबाहुर्वासुदेवो व्यवस्थित:।
किंचिद् व्यापद्यते तत्र यत्राहमपि च ध्रुवम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जहाँ महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण विद्यमान हैं और मैं भी विद्यमान हूँ, वहाँ निश्चय ही कोई कार्य बिगड़ नहीं सकता। ॥34॥
 
"Wherever the mighty-armed Lord Sri Krishna is present and I am also present, certainly no work can go wrong there." ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)