vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 7: द्रोण पर्व
»
अध्याय 84: युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना
»
श्लोक 34
श्लोक
7.84.34
न हि यत्र महाबाहुर्वासुदेवो व्यवस्थित:।
किंचिद् व्यापद्यते तत्र यत्राहमपि च ध्रुवम्॥ ३४॥
अनुवाद
जहाँ महाबाहु भगवान श्रीकृष्ण विद्यमान हैं और मैं भी विद्यमान हूँ, वहाँ निश्चय ही कोई कार्य बिगड़ नहीं सकता। ॥34॥
"Wherever the mighty-armed Lord Sri Krishna is present and I am also present, certainly no work can go wrong there." ॥ 34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×