श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 84: युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  7.84.28 
सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र सैन्धवको नृप:।
यियासुर्यमलोकाय मम वीर्यं प्रतीक्षते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इसलिए मैं यमलोक जाने की इच्छा से उस स्थान पर जाऊँगा जहाँ सिन्धुराज जयद्रथ मेरे पराक्रम की प्रतीक्षा कर रहा है॥ 28॥
 
Therefore I will go to the place where Sindhuraj Jayadratha is waiting for my valour with the desire to go to Yamaloka.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)