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mahabharat 7.82.14: वहाँ समिधाओं और मन्त्रों सहित पवित्र हवन (कुश के दो पत्ते) से अग्निदेव की पूजा करके वे उस अग्निहोत्रगृह से बाहर निकले॥14॥   |   mahabharat अध्याय 7.82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 82: युधिष्ठिरका प्रात:काल उठकर स्नान और नित्यकर्म आदिसे निवृत्त हो ब्राह्मणोंको दान देना, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सिंहासनपर बैठना और वहाँ पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.82.14 
समिद्भि: सपवित्राभिरग्निमाहुतिभिस्तथा।
मन्त्रपूताभिरर्चित्वा निश्चक्राम गृहात् तत:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
वहाँ समिधाओं और मन्त्रों सहित पवित्र हवन (कुश के दो पत्ते) से अग्निदेव की पूजा करके वे उस अग्निहोत्रगृह से बाहर निकले॥14॥
 
There, after worshiping Agnidev with sacred offerings (two leaves of Kush) along with samidhas and mantras, he came out of that Agnihotragriha. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)